उत्तराखंड में हाल के वर्षों में बड़े धार्मिक कार्यक्रमों, सामाजिक आयोजनों और राजनीतिक बहसों ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। इनमें एक बड़ा हिंदू सम्मेलन और मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami की पत्नी Geeta Dhami से जुड़ा एक एनजीओ कार्यक्रम भी शामिल रहा।
इन आयोजनों के साथ-साथ राज्य में कई गंभीर मुद्दे भी सामने आए, जैसे Ankita Bhandari हत्याकांड और कानून-व्यवस्था से जुड़े अन्य मामले।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि उत्तराखंड में असल चुनौतियां क्या हैं और क्या धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति इन मुद्दों से ध्यान भटकाने का माध्यम बन रही है।
उत्तरायण कौतिक महोत्सव और राजनीतिक चर्चा
मुख्यमंत्री की पत्नी गीता धामी द्वारा संचालित संस्था Seva Sankalp Foundation ने “उत्तरायण कौतिक महोत्सव” जैसे कार्यक्रम आयोजित किए, जिन्हें व्यापक मीडिया कवरेज मिला।
राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (DIPR) द्वारा भी इन आयोजनों को प्रमुखता से प्रचारित किया गया। आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े स्तर का प्रचार और आयोजन अक्सर मजबूत राजनीतिक नेटवर्क के कारण संभव होता है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड: न्याय की मांग
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में पीड़िता की मां ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग की। आरोप लगाए गए कि मामले में एक वीआईपी को बचाने की कोशिश की जा रही है।
यह मामला राज्य में पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या मुसलमान उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या हैं?
राज्य की राजनीति में समय-समय पर “हिंदू-मुस्लिम” विमर्श को प्रमुखता दी गई है। कुछ राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा जनसंख्या वृद्धि, अवैध अतिक्रमण और धार्मिक स्थलों के मुद्दे उठाए गए।
हालांकि, कई विश्लेषकों और पत्रकारों का कहना है कि इन दावों के समर्थन में ठोस आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वरिष्ठ पत्रकार Charu Tiwari ने अपने लेखों में बताया है कि उत्तराखंड के कई गांवों में मुस्लिम समुदाय सदियों से निवास कर रहा है और स्थानीय संस्कृति का हिस्सा रहा है।
उदाहरण के लिए, कुछ गांवों में मुस्लिम परिवार हिंदू त्योहारों और रामलीलाओं में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं। स्थानीय राजनीति में भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व कोई नई बात नहीं है।
उत्तराखंड की असली और गंभीर समस्याएं
विश्लेषण के अनुसार, राज्य जिन वास्तविक चुनौतियों से जूझ रहा है, वे निम्नलिखित हैं:
1. सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता चिंता का विषय है।
2. पहाड़ों से पलायन
रोजगार और सुविधाओं की कमी के कारण गांव खाली हो रहे हैं।
3. वन्यजीव हमले
ग्रामीण इलाकों में जंगली जानवरों के हमले बढ़ रहे हैं।
4. प्राकृतिक आपदाएं
भूस्खलन, बादल फटना और बाढ़ जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं।
5. स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर व्यवस्था
पहाड़ी जिलों में अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी है।
6. अवैध खनन
खनन से पर्यावरण को नुकसान और राजस्व हानि की शिकायतें लगातार उठती रही हैं।
7. कृषि भूमि का सिकुड़ना
खेती योग्य जमीन कम होती जा रही है।
8. रोजगार के सीमित अवसर
युवा वर्ग के लिए पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं।
9. सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार
प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
धार्मिक नैरेटिव के जरिए ध्यान भटकाने के आरोप
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप है कि “हिंदू-मुस्लिम” मुद्दा एक आसान और प्रभावी तरीका है जिससे जनता को भावनात्मक बहसों में उलझाया जा सकता है।
आरोप लगाए जाते हैं कि:
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“लव जिहाद”, “लैंड जिहाद”, “मजार जिहाद” जैसे शब्दों को बार-बार दोहराया जाता है।
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अपराधों को धार्मिक चश्मे से प्रस्तुत किया जाता है।
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आलोचकों को धार्मिक पहचान से जोड़कर बदनाम किया जाता है।
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सोशल मीडिया और आईटी सेल के जरिए विभाजनकारी संदेश फैलाए जाते हैं।
यह भी कहा जाता है कि यदि जनता मूल मुद्दों पर सवाल पूछने लगे, तो शासन व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए भावनात्मक और धार्मिक विमर्श को प्राथमिकता दी जाती है।
“हिंदुत्व लैबोरेटरी” का आरोप
कुछ आलोचकों का दावा है कि राज्य को एक “हिंदुत्व लैबोरेटरी” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है। उनका कहना है कि यदि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर समान ऊर्जा लगाई जाए, तो राज्य की तस्वीर बदल सकती है।
असहमति की आवाजों पर दबाव?
राजनीतिक माहौल में यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि जो लोग नीतियों पर सवाल उठाते हैं, उन्हें धार्मिक पहचान से जोड़कर बदनाम किया जाता है। इससे लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है और समाज में अविश्वास की भावना पैदा होती है।
निष्कर्ष: उत्तराखंड की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?
उत्तराखंड एक संवेदनशील पहाड़ी राज्य है, जहां पर्यावरण, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चुनौतियां अत्यंत गंभीर हैं।
धार्मिक बहसों से परे जाकर यदि सरकार और जनता मिलकर मूल मुद्दों पर ध्यान दें, तो:
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पलायन रोका जा सकता है
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युवाओं को रोजगार मिल सकता है
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स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हो सकती हैं
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शिक्षा प्रणाली सुधर सकती है
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भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है
अंततः यह तय करना जनता के हाथ में है कि राज्य की प्राथमिकताएं क्या हों—भावनात्मक बहसें या ठोस विकासात्मक समाधान।
उत्तराखंड के भविष्य के लिए जरूरी है कि असली समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान पर गंभीर और निरंतर काम किया जाए। source
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